
गरियाबंद में छेरछेरा दान पर्व की धूम, लोकसंस्कृति और सामाजिक समरसता का जीवंत उत्सव
ग्रामीण अंचलों में उल्लास और परंपरा की झलक
गरियाबंद | संवाददाता: नेहरू साहू (मुख्य संपादक) ग्रामीण अंचलों में उल्लास और परंपरा की झलक छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकसंस्कृति और परंपराओं का प्रतीक छेरछेरा दान पर्व इस वर्ष भी गरियाबंद जिले के ग्रामीण अंचलों में अत्यंत हर्षोल्लास और उत्साह के साथ मनाया गया। यह पर्व आपसी भाईचारे, दानशीलता और सामाजिक समरसता का संदेश देता है, जो गांव-गांव में देखने को मिला।

मकर संक्रांति पर घर-घर गूंजे लोकगीत
मकर संक्रांति के पावन अवसर पर मनाए जाने वाले इस पर्व की शुरुआत प्रातःकाल से ही हो गई। बच्चे, युवा और बुजुर्ग पारंपरिक वेशभूषा में सजे-धजे समूह बनाकर घर-घर पहुंचे और “छेरछेरा माई, कोठी के धान ला हेरहेरा” का लोकगीत गाते हुए अन्न, चावल, धान एवं अन्य सामग्री का दान एकत्र किया। ग्रामीणों ने खुशी-खुशी दान देकर पर्व की परंपरा को निभाया।
लोकनृत्य, ढोल-नगाड़े और सामूहिक भोज
पर्व के अवसर पर गांवों में लोकगीतों की गूंज, पारंपरिक नृत्यों की प्रस्तुति और ढोल-नगाड़ों की थाप से वातावरण उत्सवमय बना रहा। कई स्थानों पर सामूहिक भोज का आयोजन किया गया, जिसमें सभी वर्गों के लोगों ने सहभागिता की। इससे समाज में सहयोग, समानता और जरूरतमंदों की सहायता की भावना और सशक्त हुई।
संस्कृति, संस्कार और एकता का संदेश
ग्रामीणों का कहना है कि छेरछेरा केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को संस्कृति, संस्कार और सामाजिक एकता का पाठ पढ़ाने वाला पर्व है। यह उत्सव छत्तीसगढ़ की लोकपरंपराओं की जीवंतता और ग्रामीण जीवन की आत्मीयता को उजागर करता है, साथ ही दान और सहभागिता की परंपरा को जीवित रखता है।
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